Friday, 25 September 2015

मैंने नहीं देखा विकास ...मै हूँ अरेराज!!!

दशकों से उपेक्षित नेपाल –भारत सीमा पर अवस्थित अरेराज गाँव ।।।
#पंकज कुमार #
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कई बार अपने गाँव (अरेराज) के बदहाली,विवशी के बारे में लिखना चाहता हूँ। देश दुनिया को बताना चाहता हूँ आखिर चार पीढ़ियो के बाद भी आज तक विकास के रास्ते पर अरेराज नहीं आया।लेकिन पता नहीं क्या हो जाता है मुझे और एकाएक लिखना बंद कर देता हूँ।
इसबार तो दृढ़ प्रतिज्ञा की है मै लिख कर रहूँगा अपने जन्मभूमी [अरेराज] के बारे में। ऐसा नहीं है कि आजतक किसी ने नहीं लिखा इसके बारे में।
हमारे यहाँ भी कई लेखक,राजनीतिज्ञ,सामाजिक सरोकार वाले है। जो समय समय पर लिखते और बोलते रहे है।
पर सच कहू दिल मै एक बात कचोटती है आखिर मेरी जन्मभूमि मेरी कर्मभूमि क्यों नहीं बन पाई। क्या उन विद्वानों को आने वाले समाज की पहचान नहीं थी। जिसकी वजह से हम अपने ही देश में परदेशी बन गये।जहाँ सिर्फ मुझे ऑफिस के लोग ,एक मकान मालिक जानता है और बाद बाकि सब अनजाना है।
क्या मै अपने गाँव में रहता तो इस तरह की बेनामी जिंदगी जीता। बहुत से सवाल है जिसका उत्तर नहीं मिल पता और बात आ जाती है हमारी सरकार,प्रशासन और हमारे कर्त्वय पर।
इस देश में बड़े बड़े भाषण आजादी के पहले भी दिये गये थे और आजादी के बाद भी बदस्तूर जारी है। जो नेता कभी 65 वर्षो में सड़क की सूरत नहीं बदल पाये तो हमारी जिंदगी क्या खाक बदलेंगे।
आज भी मै अपने गाँव जाता हूँ तीन पीढ़ी पुरानी तंग हाल जर्जर हो चुकी सड़क पर चलना पड़ता है। जो मेरे परदादा और दादा के ज़माने में बना था। हालात ऐसी कि अगर आप SUV में भी बैठकर इन सड़को से गुज़रेंगे तो लगेगा कि टमटम कि सवारी कर रहे है। बिजली की हालात तो इतनी जर्जर है कि दीया और लैम्प ही हमारे रहनुमा है रात के लिये।
एक बात कहू यह भारत के वर्तमान कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह का संसदीय एरिया है। चार बार यहाँ की जनता ने उन्हें संसद पहुँचाया है लेकिन यहाँ कि जर्जरता अभी भी जस की तस है। बात यही खत्म नहीं होती। इस धरती को और भी पावन बनाती है यहाँ कि वर्षो पुरानी प्रसिद्ध सोमेश्वर नाथ मंदिर । जिसकी चर्चा शिव पुराण और स्कंद पुराणों में मिलती है। यहाँ पर प्रत्येक वर्ष भारत के हर कोने कोने से भक्त आते है  साथ ही साथ बगल देश नेपाल और भूटान से भी लोग यहाँ पूजा अर्चना करने आते है।
इस गांव की गाथा यही खत्म नहीं होती है पुरात्तव के लिहाज से भी यह एरिया बहुत महत्वपूर्ण है। आज भी सम्राट अशोक द्वारा स्थापित शांति लौह स्तूप है। सारे संसार को शांति का संदेश देता है।
अगर भौगोलिक दृष्टीकोण से देखे तो यह गाँव नेपाल के अंतरराष्ट्रीय सीमा से बिल्कुल निकट में है।
ऐसी स्थिति में इस गाँव को आजादी के इतने वर्षो के बाद भी उपेक्षित रखा गया है। 22000 हज़ार की आबादी वाला इस गाँव की शिक्षा दर महज 40  प्रतिशत से भी कम है। महिलाओं की स्थिति और भी दयनीय है। यहाँ पर सरकारी स्कूल,कॉलेज है पर शिक्षा व्यवस्था ठीक नहीं है। प्राइवेट स्कूल भी है वह भी  निचले स्तर वाले। जिन परिवारों कि स्थिति ठीक है वह अपने बच्चे को बाहर भेज पढ़ाई लिखाई करवा रहे है।
एक लाइब्रेरी नहीं है जहाँ लोगोँ को पुस्तक मिले। इस तरह मुश्किलों से जूझ कर कोई कुछ बन भी जाता है तो उसकी क़ाबलियत है न कि सिस्टम की देंन।
सरकारी योजनाओं के बारे में आप तो भली भाँति जानते हो। योजनाओ का लाभ गरीबो के मिलने के बदले दबंगों को मिल जाती है। इन्दिरा आवास, बीपीएल,एपीएल, जैसी कितनी योजनाएँ है पर लाभ किसी को नहीं मिल रहा है।
इस देश में 60 वर्षो में एक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर अवस्थित गाँव स्मार्ट नहीं बन सका तो इससे ज्यादा तकलीफदेह क्या होगा।
शायद कोई सांसद और कॉरपोरेट जगत इस छोटे आबादी वाले गाँव को गोद ले तो यहाँ हज़ारों जिंदगिया एक नई करवट लेगी।

समाप्त।

Thursday, 24 September 2015

छः दशकों से गरीबी की मृगतृष्णा:झूठे और फरेब वादे

एक चुनाव में करोड़ो रुपये पानी की तरह सरकार व चुनाव आयोग की तरफ से बहाये जाते है। ताकि हमें देश /राज्य/पंचायत स्तर पर एक लोकतांत्रिक व्यवस्था  मिले और समाज में शासन और प्रशासन बहाल रहे। जिसे आम और खास लोगों को एक सुविधा मिले। पर सच्चाई यह है कि सुविधा तो कुछ मिल नहीं रही है और जनता के पैसे पानी की तरह विकास के नाम पर बहाये जा रहे है।
चुनाव के दौरान चाहे देश के 10 जनपथ के दावेदार  हो या फिर पंचायत के मुखिया सब का मालिक जनता -जनार्धन हो जाती है और जीत मिलने के बाद जनता इनके लिये सिर्फ #जनसाधारण हो जाती है। यह नेताओं की दोगली नीति हर पांच साल पर जनता पर आजमाई जाती है।
                  जब से होश संभाला है यानि ठीक ठाक पिछले 15 वर्षो में हुए चुनाव याद है।चाहे वह लोक सभा हो, विधान सभा हो या फिर पंचयात का चुनाव।
नेताओं कि बात करने कि जादूगरी, मरहूम बाप -दादा के नाम पर वोट मांगते देखा, खुद की पहचान बता कर वोट मांगते देखा। पर सच कहू पिछले किये हुए कार्यो के नाम पर किसी को आज तक वोट मांगते नहीं देखा।
शहर में थोड़ा बहुत ठीक ठाक कार्य भी हो जाता है पर गाँव की स्थिति और चिंतनीय हो गयी है। वहाँ के लोगों को पानी,बिजली,शिक्षा,चिकित्सा व रोजगार से महरूम रखा गया है। वजह है सिर्फ और सिर्फ वोट बैंक। जब कुछ सुविधा नहीं देने से आराम से वोट मिल जाये तो हर्ज़ क्या है।

इस लोकतांत्रिक देश में हमारी हालात रेगिस्तान में भटके एक ऐसी राहगीर की तरह हो चुकी है, जो पिछले छः दशकों से गरीबी, पानी,बिजली,शिक्षा,चिकित्सा व रोजगार की मृगतृष्णा में नेताओं को संसद, विधान सभा भेज रहा है। 

एक बार फिर वक़्त आया है आखिर किसे चुने??? जवाब आपके पास है।