एक चुनाव में करोड़ो रुपये पानी की तरह सरकार व चुनाव आयोग की तरफ से बहाये जाते है। ताकि हमें देश /राज्य/पंचायत स्तर पर एक लोकतांत्रिक व्यवस्था मिले और समाज में शासन और प्रशासन बहाल रहे। जिसे आम और खास लोगों को एक सुविधा मिले। पर सच्चाई यह है कि सुविधा तो कुछ मिल नहीं रही है और जनता के पैसे पानी की तरह विकास के नाम पर बहाये जा रहे है।
चुनाव के दौरान चाहे देश के 10 जनपथ के दावेदार हो या फिर पंचायत के मुखिया सब का मालिक जनता -जनार्धन हो जाती है और जीत मिलने के बाद जनता इनके लिये सिर्फ #जनसाधारण हो जाती है। यह नेताओं की दोगली नीति हर पांच साल पर जनता पर आजमाई जाती है।
जब से होश संभाला है यानि ठीक ठाक पिछले 15 वर्षो में हुए चुनाव याद है।चाहे वह लोक सभा हो, विधान सभा हो या फिर पंचयात का चुनाव।
नेताओं कि बात करने कि जादूगरी, मरहूम बाप -दादा के नाम पर वोट मांगते देखा, खुद की पहचान बता कर वोट मांगते देखा। पर सच कहू पिछले किये हुए कार्यो के नाम पर किसी को आज तक वोट मांगते नहीं देखा।
शहर में थोड़ा बहुत ठीक ठाक कार्य भी हो जाता है पर गाँव की स्थिति और चिंतनीय हो गयी है। वहाँ के लोगों को पानी,बिजली,शिक्षा,चिकित्सा व रोजगार से महरूम रखा गया है। वजह है सिर्फ और सिर्फ वोट बैंक। जब कुछ सुविधा नहीं देने से आराम से वोट मिल जाये तो हर्ज़ क्या है।
इस लोकतांत्रिक देश में हमारी हालात रेगिस्तान में भटके एक ऐसी राहगीर की तरह हो चुकी है, जो पिछले छः दशकों से गरीबी, पानी,बिजली,शिक्षा,चिकित्सा व रोजगार की मृगतृष्णा में नेताओं को संसद, विधान सभा भेज रहा है।
एक बार फिर वक़्त आया है आखिर किसे चुने??? जवाब आपके पास है।
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